विधि:
अनुलोम-विलोम प्राणायाम को बाए नासिका से प्रारम्भ करते है। अंगुष्ठ के माध्यम से दाहिनी नासिका को बंध करके बाई नाक से श्वास धीरे-धीरे अंदर भरना चाहिए। श्वास पूरा अंदर भरने पर ,अनामिका व् मध्यमा से वामश्वर को बन्ध करके दाहिनी नाक से पूरा श्वास बाहर छोड़ देना चाहिए। धीरे-धीरे श्वास-पश्वास की गति मध्यम और तीव्र करनी चाहिए। तीव्र गति से पूरी शक्ति के साथ श्वास अन्दर भरें व् बाहर निकाले व् अपनी शक्ति के अनुसार श्वास-प्रश्वास के साथ गति मन्द,मध्यम और तीव्र करें। तीव्र गति से पूरक, रेचक करने से प्राण की तेज ध्वनि होती है। श्वास पूरा बाहर निकलने पर वाम स्वर को बंद रखते हुए दाए नाक से श्वास पूरा अन्दर भरना चाहिए तथा अंदर पूरा भर जाने पर दाए नाक को बन्द करके बाए नासिका से श्वास बाहर छोड़ने चाहिए। यह एक प्रकियापुरी हुई। इस प्रकार इस विधि को सतत करते रहना। थकान होने पर बीच में थोड़ा विश्राम करे फिर पुनः प्राणायाम करे। इस प्रकार तीन मिनिट से प्रारम्भ करके इस प्राणायाम को १० मिनिट तक किया जा सकता है।
लाभ:
१. इस प्राणायम से बहत्तर करोड़,बहत्तर लाख,दस हजार दो सौ दस नाड़ियाँ परिशुद्ध हो जाती है।
२. संधिवात,कंपवात,गठिया,आमवात,स्नायु-दुर्बलता आदि समस्त वात रोग,धातुरोग,मूत्ररोग शुक्रक्षय ,अम्लपित्त ,शीतपित्त आदि समस्त पित्त रोग,सर्दी,जुकाम,पुराना नजला,साइनस,अस्थमा,खाँसी,टान्सिल समस्त रोग दूर होते है।
3. इस प्राणायाम का नियमित अभ्यास करने से तीन-चार माह में ३०% लेकर ५०% तक ब्लोकेज खुल जाते है। कोलेस्ट्रोल,एच. डी. एल. या एल. डी. एल. आदि की अनियमितताएं दूर हो जाती है। इस प्राणायाम से तन,मन,विचार छ संस्कार सब परिशुद्ध होते है।
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